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Showing posts from July, 2018

द्वार खटका रही है

तम घना सा, अनमना सा उर, निलय खो सा गया हो !                                  नवल किसलय ! भ्रमर का गुंजार न हो ! समझ लो बस अब निशा जा ही रही है | °°° °°° °°° कली गुमसुम, नव कुसुम का उर, व्यथ...

आज अलि मैं क्या लिखूँ?

आज अलि मैं क्या लिखूँ? भग्न बादल की अरुण आभा लिखूं या सुनहले व्योम की मोहक कथा सूखती सी झील की पीड़ा लिखूं आज अलि मैं क्या लिखूं? डबडबाई आंख कृषकों की झरी कह रही चूल्हे के क्रं...

सुविचार

लेखनी की धार में वीणा में, सितार में मित्र के अभाव में कवि के स्वभाव में व्यथा का अवश्य एक कोष होना चाहिए। युद्ध की गुहार में शस्त्र के प्रहार में योद्धा को जंग में लक्ष्य क...

लड़की और बेटी

मौन हो तुम लेखनी ! आज अरु में क्या लिए तुम अनमनी? मौन हो तुम लेखनी ! काव्य में जीवन तुम्हारा है पला तिमिर को तुमने प्रकाशित कर दिया सत्य का दीपक तुम्ही से है जला हृदय को भावों से ...

मुस्कान

इक तेरी मुस्कान जीती बस तेरा ही शान जीता हम तो हारे इस कदर जैसे कोई सम्मान जीता ।। चाँद तारे छिप गए पर जुगनुओं का मान जीता रात अंधियारी रही पर दीप का अभिमान जीता ।। मुश्किलो ...

बचपन

कई दरवाजों का वो घर बहुत चौङा सा वो आँगन कहीं मिट्टी कहीं ईंटें जहाँ गुज़रा मेरा बचपन ।। अभी तो बस गुज़ारा है नही घर भी हमारा है ये जो छोटे से कमरे हैं यही संसार सारा है।। वो रस्...

महामानव

मीत कहो मैं कैसे तुम पर गीत कोई भी गाऊं जब तक सीमा पर वीरों के लिये न कुछ लिख पाऊं। लहू पसीने से जिनके स्वर्णिम है देश का सपना उनकी गौरव गाथा से मैं काव्य सींच लूं अपना। वृद्ध ...

ग़ज़ल

चलो मशाल जला कर के कहीं यूं रख दें कोई गुमनाम सी बस्ती भी जगमगा जाये। चलो उस दूर की बस्ती में कुछ ऐसा कर दें किसी ग़रीब की आंखों में चमक आ जाये। वो बूढ़ी मां जो कई रात से सोयी ही नह...

ग़ज़ल

किसी ग़रीब को भी अपना बनाकर रक्खो दिल मे इंसाफ की एक शम्मा जलाकर रक्खो। रहो मानूस मगर दूरियां पुख्ता भी रहें कहीं जज़्बात को सीने में दबाकर रक्खो। तरन्नुम हूं तो मुझे लब पे स...

मुझको इतना प्यार न देना

मुझको इतना प्यार न देना खुशियों का अम्बार न देना। मस्तक झुका सकूँ न पल भर प्रेम का इतना भार न देना। पलकें बोझिल सजल रहें उन यादों की भरमार न देना। जिन्हें न तुम साकार करो उन सपनों का संसार न देना। रहूं एकला कभी जगत में मुझको ये परिहार न देना। सुर-लय बिखर चलें इक क्षण तुम इतना भी झनकार न देना। मुझको इतना प्यार न देना --- डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

देशभक्ति (कविता)

जब गीता के आदर्शों का प्रतिपल खंडन होता हो सड़कों पर जब हत्यारों का महिमा मण्डन होता हो जब गलियों में गिद्ध देश के ध्वज फहराए जाते हों जब धरती के रक्षक पर पत्थर बरसाए जाते हो...

बचपन और अब

• • •   बचपन   • • • कई दरवाजों का वो घर बड़ा चौंड़ा सा वो आँगन कहीं मिट्टी कहीं ईंटें जहाँ गुज़रा मेरा बचपन ।। अभी तो बस गुज़ारा है नही घर भी हमारा है ये जो छोटे से कमरे हैं यही संसा...

लिबास

लो देख लो पहन ली हमने भी मानवता ओढ़ लिया संस्कारों का लिबास अलंकृत कर दी संस्कृति से लगा लिया देशभक्ति का टीका । लो देख लो ये लिबास कितना अद्भुत है कितना आकर्षण इसके रंगों म...

नन्ही कविता

अभी क्षितिज के मृदु अधरों से नन्ही कविता झांक रही थी किस पल धरणी पर पग रख दूं स्वर्णिम अवसर ताक रही थी लिपटी थी कोमल वसनों में मानवता के धागों में थी प्रेम ज्योति से दीप्त ह...

लक्ष्य

सुभाषिनो से दूर मुझे मद में मत करना चूर मुझे इस  सरस  तमसमय दुनिया में पहचान अभी  अधूरी है । रोशन  होकर जब दुनिया में चमकेगी अपनी भी आभा जब भाव हृदय में बरसेंगी और चहक उठेगी ...

नारी और कविता

लो तुम भी देख लो सनद कर लो, टटोल लो एक बार नही कई बार कविताएं रख ली हैं हमने अपने जेब में पहन लिया है नया वस्त्र नारी शक्ति का परिचायक ओढ़ लिया है पीताम्बर जिसपर उकेरा है नीलवर्...

परिस्थिति जन्य

जब विषाक्त हो जाये चिन्तन मूक - वधिर हो जब अंतर्मन वाणी में जब गरल वमन हो शब्दों से जब अहम शमन हो भाषा जब गरिमा विहीन हो प्रतियुत्तर जब लक्ष्य हीन हो भ्रम के झंझावात बढ़े जब दि...

कहो प्रिये इस शाम क्या लिखूँ?

कहो प्रिये इस शाम क्या लिखूँ? गीत तुम्हारे नाम क्या लिखूँ ? अंतस्तल में तुम्ही चतुर्दिक फिर तुमको पैगाम क्या लिखूँ ? क्या लिख दूं बचपन की यादें जब कंचे खेला करते थे या जब पेड़...

समय ने क्या कह दिया

समय ने क्या कह दिया! तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे! तुम अटल थे, सत्य भी थे, निडर थे तुम चले जिस पर उचित वो डगर थे किन्तु अवसर पा कदाचित सहज ही पवन ने क्या कह दिया! तुम किधर थे किस दिश...

जिंदगी

जिंदगी की इस उमड़ती आग में, कब से मुरझाते हुए इस बाग में, प्यार का पौधा लगाने आ गया हूँ, लो पुनः मैं गीत गाने आ गया हूँ। फूल मुरझाए हुए भी हंस दिए, टहनियां सूखी हरी होने लगीं, कोपल...

वेदना

'वेदना' तुम कौन हो? प्रकृति से ही शान्त-निश्चल हर डगर पर साथ अविचल निज हृदय की असह पीड़ा भूलकर तुम अनवरत साथ देती जा रही हो जब रवि किरणे नाहायीं स्वतः परछाई भी आयी रात्रि के आंच...

महिला

स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम जननी हो भगनी हो और वत्सला हो , स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम प्रेम दीप में जलने वाली बाती हो , खुद जलकर भी सबको प्रकाश दिखलाती हो , तुम पति का कवच पुत्र की ...

नारी सम्मान

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स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम जननी हो भगनी हो और वत्सला हो , स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम प्रेम दीप में जलने वाली बाती हो , खुद जलकर भी सबको प्रकाश दिखलाती हो , तुम पति का कवच पुत्र की शक्ति और भाई की प्रबला हो , स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम जब भी अपने घर का चौखट लांघोगी, कुछ भौंहे तुम पर शायद तनी हुई होंगी, तुम जब भी गलियों से नुक्कड़ से निकलोगी , कुछ शब्द तीर से तुमको भेद रहे होंगे तुम जब भी सड़कों से भीड़ों से जाओगी, कुछ लोग तुम्हे दुस्चरिता भी कह जायेंगे , कुछ ऑंखें चीर रही होंगी कुछ ठोकर भी लग जायेंगे , तुम इन सबको अनदेखा कर बढती रहना , अनवरत सफलता के सिख तक चढ़ती रहना , तुम धता बता देना उनको जो कहते हैं तुम निबला हो , स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम दिखला दो ये जगत तुम्ही से सस्वर है , तुम हो तो जीवन है, धरती है, अम्बर है , तुम जीवन की आधारशिला ही नहीं सिर्फ, तुम बिन मिथ्या है सकल जगत और निस्वर है, तुम दिखला दो इस दुनिया को तुम सबला हो, स्मरण रहे तुम महिला हो | स्मरण रहे तुम महिला हो | तुम जननी हो भगनी हो और वत्सला हो , स्मरण रहे तुम महिला हो | डॉ उदय प्रताप सिंह “अर्णव”