द्वार खटका रही है
तम घना सा, अनमना सा उर, निलय खो सा गया हो ! नवल किसलय ! भ्रमर का गुंजार न हो ! समझ लो बस अब निशा जा ही रही है | °°° °°° °°° कली गुमसुम, नव कुसुम का उर, व्यथ...
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