बचपन

कई दरवाजों का वो घर
बहुत चौङा सा वो आँगन
कहीं मिट्टी कहीं ईंटें
जहाँ गुज़रा मेरा बचपन ।।

अभी तो बस गुज़ारा है
नही घर भी हमारा है
ये जो छोटे से कमरे हैं
यही संसार सारा है।।

वो रस्ते पर गुज़रते जो
दुआ परणाम होता था
कई कोसों के गांवों में
भी अपना नाम होता था।।

यहां तो बगल वाले भी
नही हैं जानते हमको
कोई गालियां कोई रस्ते
नही पहचानते हमको।।

ये बस जीवन गुज़रना है
अरण्यों में विचरना है
मूल बस धन-पिपासा है
लालच की विपाशा है।।

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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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