लक्ष्य

सुभाषिनो से दूर मुझे
मद में मत करना चूर मुझे
इस  सरस  तमसमय दुनिया में
पहचान अभी  अधूरी है ।

रोशन  होकर जब दुनिया में
चमकेगी अपनी भी आभा
जब भाव हृदय में बरसेंगी
और चहक उठेगी अभिलाषा
श्वासोँ के थकने से पहले
कुछ  करना बहुत जरूरी है ।
ये ज्ञान अधूरा है मेरा
साधना बहुत जरूरी है ।

जब जब निज मन की इच्छायें
आशाएं बन के  उठती हैं
करती हैं भाव विभोर मुझे
लक्ष्योन्मुख प्रेरित करती हैं
इन बढ़ती चढ़ती राहों में 
मुझको डस लेने के खातिर
बहुतेरे कंटक सर्प बहुत।
इन विपदाओं से लड़ने को
अब साहस बहुत जरूरी है
पाने को अपना लक्ष्य अभी
सद्ज्ञान बहुत जरूरी है ।।

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डॉ रवि प्रताप सिंह

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