ग़ज़ल
चलो मशाल जला कर के कहीं यूं रख दें
कोई गुमनाम सी बस्ती भी जगमगा जाये।
चलो उस दूर की बस्ती में कुछ ऐसा कर दें
किसी ग़रीब की आंखों में चमक आ जाये।
वो बूढ़ी मां जो कई रात से सोयी ही नहीं
उसे अपनों के भी होने की भनक आ जाये।
आज की शब इसी बागीचे में रहो 'अर्णव'
हवा में सोंधी सी मिट्टी की महक आ जाये।
---
डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
Comments
Post a Comment