नन्ही कविता
अभी क्षितिज के मृदु अधरों से
नन्ही कविता झांक रही थी
किस पल धरणी पर पग रख दूं
स्वर्णिम अवसर ताक रही थी
लिपटी थी कोमल वसनों में
मानवता के धागों में थी
प्रेम ज्योति से दीप्त हो रही
नैषर्गिक अनुरागों में थी।
लाज समेटे हुए छिपी थी
यौवन कतिपय लौकिक था
अल्हड़ चपला सी विह्वल थी
दर्शन भाव अलौकिक था
तभी उसे दिख गयी धरा पर
मानवता खंडित होती
धर्म जाति में बंट बंट कर
हर पल महिमामंडित होती।
नन्ही सी थी परी डर गयी
उसको इसका भान न था
जब पहने थे शुभ्र वस्त्र
तब ऐसा भी इंसान न था
पुस्तक मंच पत्रिका देखा
कहीं नही अवसर निकला
विकृत हुई मानवता पग पग
नर पिशाच घर घर निकला।
हिन्दू कहीं कहीं मुस्लिम था
रक्त पिपासु कहीं घाटी थी
कहां गयी जो वह सुनती थी
ममतामयी मृदुल माटी थी
क्या दिग्भ्रमित हुई थी वह ही
जहां न जाना था आयी थी
या मनु की पावन नगरी में
विपदाओं की अँगड़ाई थी ?
सुनती थी भारत माता को
मलय पवन की अरुणाई थी
मस्तक पर रज कण चन्दनमय
गिरि-तरु-वन की परछाई थी
जहां सुना था नीर अमय था
वसुंधरा पुष्पित होती थी
आज अनोखा वहीं प्रलय था
प्रकृति आज छुपकर रोती थी।
कहीं व्यथित ब्राह्मण कुलभूषण
कहीं शान में क्षत्रिय कुल था
कहीं विभाजन या आरक्षण
कोई भ्रांतियों में व्याकुल था
टुकड़ों में बंट रहा देश था
बंटवारे के नारे स्वर थे
सुगम बिक रही जो नफरत थी
क्रेता हर द्वारे हर घर थे।
कहीं तिरंगा सिसक रहा था
लथपथ था उन्मादों से
भारत माता विलख रही थी
रक्त पिपासु विवादों से
बहन बेटियों की मर्यादा
तार तार होकर बिखरी थी
माँ की कोख-व्यथा अनियंत्रित
नेत्रों से ही बह निकली थी।
सिमट गई अपने मे ही खुद
सिहर गयी थी सन्नाटे से
प्यारी सी नन्ही कविता थी
तड़ित लगी थी झन्नाटे से
कैसे आ जाती इस युग मे
'अर्णव' जहां हृदय मरुथल था
मधुर गीतिका रही अजन्मी
भाव क्षितिज ही उसका तल था।
---
डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
Comments
Post a Comment