सुविचार
लेखनी की धार में
वीणा में, सितार में
मित्र के अभाव में
कवि के स्वभाव में
व्यथा का अवश्य एक कोष होना चाहिए।
युद्ध की गुहार में
शस्त्र के प्रहार में
योद्धा को जंग में
लक्ष्य के मलंग में
शक्ति से स्वयं आशुतोष होना चाहिए ।
काव्य के विभाव में
नृत्यिका के भाव मे
कल्पना के रंग में
ऋतु के अनंग में
हृदय में स्व-सृजित पारितोष होना चाहिए ।
बालक के सीख में
भिक्षुक के भीख में
उद्यम के मित्र में
शिक्षक के चरित्र में
तिनके सा भी नही दोष होना चाहिए ।
गुरु को प्रणाम में
भद्रजन के नाम में
नारी से हर बात में
दीन को सौगात में
नम्रता का भाव पूर्ण पोष होना चाहिए ।
छात्र के आचार में
दण्ड के विचार में
त्याग में, परीक्षा में
शत्रु की समीक्षा में
मानस पटल पे न आक्रोश होना चाहिए ।
तर्क के प्रमाण में
संकटों से त्राण में
प्रभुता के घमंड में
पृवृत्ति से उदंड में
भाषा मे नही कभी भी रोष होना चाहिए ।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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