लिबास
लो देख लो
पहन ली हमने भी मानवता
ओढ़ लिया संस्कारों का लिबास
अलंकृत कर दी संस्कृति से
लगा लिया देशभक्ति का टीका ।
लो देख लो
ये लिबास कितना अद्भुत है
कितना आकर्षण इसके रंगों में
पर भीतर ही भीतर घुटन है
कुछ चिपचिपी सी
कुछ लसलसी सी ।
लो देख लो
ये चिपचिपाहट है विचारों की
ये लसलसाहट है संस्कारों की
झूठ के मुखौटों से टपक रहा हर क्षण
ये घुटन है स्वार्थ की, गद्दारी की ।
लो देख लो
तुम भी पहन लो यही लिबास
मौन है हर दिशा, मौन है रक्त
चुप है हर जीव, सहमा है वक्त
यही तुम्हारा देश है ।
लो देख लो।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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