महिला
स्मरण रहे तुम महिला हो |
तुम जननी हो भगनी हो और वत्सला हो ,
स्मरण रहे तुम महिला हो |
तुम प्रेम दीप में जलने वाली बाती हो ,
खुद जलकर भी सबको प्रकाश दिखलाती हो ,
तुम पति का कवच पुत्र की शक्ति और भाई की प्रबला हो ,
स्मरण रहे तुम महिला हो |
तुम जब भी अपने घर का चौखट लांघोगी,
कुछ भौंहे तुम पर शायद तनी हुई होंगी,
तुम जब भी गलियों से नुक्कड़ से निकलोगी ,
कुछ शब्द तीर से तुमको भेद रहे होंगे
तुम जब भी सड़कों से भीड़ों से जाओगी,
कुछ लोग तुम्हे दुस्चरिता भी कह जायेंगे ,
कुछ ऑंखें चीर रही होंगी कुछ ठोकर भी लग जायेंगे ,
तुम इन सबको अनदेखा कर बढती रहना ,
अनवरत सफलता के सिख तक चढ़ती रहना ,
तुम धता बता देना उनको जो कहते हैं तुम निबला हो ,
स्मरण रहे तुम महिला हो |
तुम दिखला दो ये जगत तुम्ही से सस्वर है ,
तुम हो तो जीवन है, धरती है, अम्बर है ,
तुम जीवन की आधारशिला ही नहीं सिर्फ,
तुम बिन मिथ्या है सकल जगत और निस्वर है,
तुम दिखला दो इस दुनिया को तुम सबला हो,
स्मरण रहे तुम महिला हो |
स्मरण रहे तुम महिला हो |
तुम जननी हो भगनी हो और वत्सला हो ,
स्मरण रहे तुम महिला हो |
डॉ उदय प्रताप सिंह “अर्णव”
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