वेदना

'वेदना' तुम कौन हो?
प्रकृति से ही शान्त-निश्चल
हर डगर पर साथ अविचल
निज हृदय की असह पीड़ा भूलकर
तुम अनवरत साथ देती जा रही हो

जब रवि किरणे नाहायीं
स्वतः परछाई भी आयी
रात्रि के आंचल में छिप कर सो गयीं
तुम अथक सहगामी बनती जा रही हो

पथ में कांटे भी रहे हैं
अनगिनत बाधा सहे हैं
धूप बारिश और शीतल छांव में भी
तुम निरंतर हाथ देती आ रही हो

हर्ष में भी साथ हो
संघर्ष में भी साथ हो
मस्तिष्क के साम्राज्य का विस्तार हो
तुम व्यथा में भी हृदय का आकार हो

और फिर भी मौन हो!
'वेदना' तुम कौन हो?

डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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