देशभक्ति (कविता)

जब गीता के आदर्शों का प्रतिपल खंडन होता हो
सड़कों पर जब हत्यारों का महिमा मण्डन होता हो
जब गलियों में गिद्ध देश के ध्वज फहराए जाते हों
जब धरती के रक्षक पर पत्थर बरसाए जाते हों
मांग रहा हो जहां तिरंगा अपनी ही आज़ादी को
बहन बेटियों की मर्यादा जब घर मे फरियादी हो
जब भारत माता के टुकड़े करने की आवाज उठे
जब हिंदुत्व मिटाने के षड्यंत्र बनें अंदाज उठे
गीता कहती शस्त्र उठा लो, दुष्टों का संहार करो
रक्तहीन कर दो खल-दल को लौह भुजा से वार करो
नीति कहे वीरों का इस धरती पर युद्ध ही है गहना
दफना दो खल-दुष्टों को यदि मर्यादा में है रहना
जाग उठो अब देशवासियों शत्रु तुम्हे ललकार रहा
उठो कुचल दो उस फन को जो है तुम पर फुफकार रहा
छलनी कर दो उस पिशाच को जो सेना पर वार करे
टुकड़े कर दो जो माँ-बहनों की इज़्ज़त को तार करे
काट फेंक दो द्रोही को जो भारत का अपमान करे
वहां गाड़ दो आज तिरंगा जहां शत्रु अभिमान करे।।
जय हिंद । जय भारत ।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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