लड़की और बेटी

मौन हो तुम लेखनी !
आज अरु में क्या लिए तुम अनमनी?
मौन हो तुम लेखनी !

काव्य में जीवन तुम्हारा है पला
तिमिर को तुमने प्रकाशित कर दिया
सत्य का दीपक तुम्ही से है जला
हृदय को भावों से तुमने भर दिया

तुम अथक चलती रही निःस्वार्थ होकर
आज क्यों फिर अश्रुओं से तुम सनी?
मौन हो तुम लेखनी !

अपना तो जीवन से ये अनुबंध है
हम लिखेंगे अनवरत ये ध्येय है
क्लांति शान्ति का नही श्रृंगार है
मौन से संबंध न पाथेय है

कहीं तुम चुप तो नही यह सोचकर
एक माँ ने आज दुहिता फिर जनीं ?
मौन हो तुम लेखनी !

कष्ट है शायद तुम्हे इस बात का
वनिता क्यों बलि हो रही आमोद में
लड़कियों की हर तरफ क्यों चाह है
बेटियाँ क्यों जल रही हैं गोद मे ?

वन्धवि, सहभागिनी, ममतामयी होकर
आज बेटी रक्त से है क्यों सनी ?
मौन हो तुम लेखनी !

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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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