समय ने क्या कह दिया
समय ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम अटल थे, सत्य भी थे, निडर थे
तुम चले जिस पर उचित वो डगर थे
किन्तु अवसर पा कदाचित सहज ही
पवन ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम जहां ठिठके जहां ठहरे उचित था
था वहीं गंतव्य निश्चित था रचित था
मचल कर पगधूलिका की सी भला
निलय ने क्या कह दिया !
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम उड़े तो पंख कुछ कोमल उठे थे
तुम मुड़े तो गगन में भांवर पड़े थे
मैं अकिंचित कह न पाऊँ पर तुम्हे
क्षितिज ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम हंसे तो मौन भी सस्वर हुआ था
तुम बढ़े तो प्रगति का ही स्वर हुआ था
शांति की प्रस्तावना के द्वार ही पर
हृदय ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम पथिक से पथ बने पाथेय भी थे
अग्नि बन कर स्वास में तुम ध्येय भी थे
सृजन के उद्देश्य के पावन क्षणों में
अनल ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
तुम शाश्वत शांति की प्रस्तावना थे
सृष्टि में माधुर्य की तुम भावना थे
सहज से इस लक्ष्य के ऊंचे शिखर पर
विजय ने क्या कह दिया!
तुम किधर थे किस दिशा जाने लगे!
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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