महामानव

मीत कहो मैं कैसे तुम पर गीत कोई भी गाऊं
जब तक सीमा पर वीरों के लिये न कुछ लिख पाऊं।
लहू पसीने से जिनके स्वर्णिम है देश का सपना
उनकी गौरव गाथा से मैं काव्य सींच लूं अपना।
वृद्ध पिता माता को जो इकलौता छोड़ गए हैं
भौतिकता की सारी खुशियों से मुख मोड़ गए हैं।
जो वापस कंधों पर चलकर अपने घर आते हैं
जिनकी सांसों के बदले हम दीप जला पाते हैं।
हाय, सुहागिन के दिल में क्या शूल उभरता होगा
मेहंदी से पहले जिसका सिंदूर उतरता होगा।
उस आँगन का दर्द लेखनी पर छाया जाता है
किलकारी से पहले जिसमे शव लाया जाता है।
ऐसे महामानवों का मस्तक नमामि वंदन है
ऋणी रहेगा देश तुम्हारा हार्दिक अभिनंदन है।

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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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