नारी और कविता

लो तुम भी देख लो
सनद कर लो, टटोल लो
एक बार नही कई बार
कविताएं रख ली हैं हमने अपने जेब में
पहन लिया है नया वस्त्र
नारी शक्ति का परिचायक
ओढ़ लिया है पीताम्बर
जिसपर उकेरा है नीलवर्ण से
नारी स्वतंत्रता का चित्र।

जीत लिया है तुम्हारा विश्वास
पा लिया है तुम्हारा समर्थन
कितनी पवित्र हो तुम
कितनी विचित्र हो तुम
पर यही है तुम्हारा भोलापन
यही है तुम्हारा भेद
बिना देखे, बिना टटोले
कर लिया है तुमने विश्वास
बना लिया है अपना मित्र।

परंतु ये जेब!
कुछ चिपचिपा सा है
कुछ लसलसा सा है
जो अभी भी है बाहर आने को आतुर
इसको कैसे रोकूँ, कैसे छिपाऊं
जेब को कैसे समझाऊं
डर भी रहा हूँ, भयभीत हूं
कहीं खुल कर सामने न आ जाये
छिपा हुआ मेरा मेरा चरित्र।

ये चिपचिपाहट है विचारों की
ये लसलसाहट है मानसिकता की
जो अभी भी पुरुषत्व से नही है बाहर
जो अभी भी देख रहा है तुममे
एक अबला, एक शक्तिहीन नारी
पर कविता में नारी का पुजारी है
आराध्य है नारी हर पंक्ति में
आराधना है कवि के हर शब्द में
खो गया है कविता का उद्देश्य
सिमट गई है मानसिकता
धूमिल हो गये है विचार
कुछ दलदला सा हो गया है
मनोविज्ञान व साहित्य
सोचता हूँ सत्य का ये उद्घाटन
तुम्हारे लिए होगा कितना विचित्र।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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