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श्री राम : कृपा निधान

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                   ॐ  श्री रघुनाथ के गहे चरण तो  रहेगा कहाँ दुःख, तन में न मन में ! जानकीनाथ करें जो कृपा तो समाये कहां सुख इस त्रिभुवन में ! रघुनंदन जो उठायें धनुष तो कौन है सम्मुख, धरती गगन में ! कौन विपत्ति हो, दुःख या दरिद्री जो मन चितवे श्री रमा-रमण में ! 'राम' का नाम कृपा के निधान बखान करूं कि रखूं निज मन में! जानकीवल्लभ दें जो अनुज्ञा तो  दास बनेंगे सकल त्रिभुवन में । भक्त सभी प्रभु तार दिए कि रहे प्रभु चाहे कुटीर में, वन में ठहरेंगे कोई भी कष्ट नहीं जो भजो प्रभु राम का नाम भजन में मत हो उदास, हताश न हो मन राम ही राम भजो जीवन में। राम करेंगे सुगम सब पंथ, कि श्री रघुवीर सा को देवन में! -- Dr. U. P. Singh Professor Department of Mathematics, Harcourt Butter Technician University Kanpur