जिंदगी
जिंदगी की इस उमड़ती आग में,
कब से मुरझाते हुए इस बाग में,
प्यार का पौधा लगाने आ गया हूँ,
लो पुनः मैं गीत गाने आ गया हूँ।
फूल मुरझाए हुए भी हंस दिए,
टहनियां सूखी हरी होने लगीं,
कोपलों को भोर सा मैं भा गया हूँ,
लो पुनः मैं गीत गाने आ गया हूँ।
डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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