परिस्थिति जन्य

जब विषाक्त हो जाये चिन्तन
मूक - वधिर हो जब अंतर्मन
वाणी में जब गरल वमन हो
शब्दों से जब अहम शमन हो
भाषा जब गरिमा विहीन हो
प्रतियुत्तर जब लक्ष्य हीन हो
भ्रम के झंझावात बढ़े जब
दिशाहीन जज़्बात बढ़ें जब
तर्क कलुष-पोषित हो जाएं
भाव मलिन-दूषित हो जाएं
जब स्वर का परिमाण बढ़ाकर
छद्म साक्ष्य को आड़ बनाकर
ज्ञान-सृष्टि पर वाण चलायें
ध्वनि ऊर्जा जब ध्वज फहराएं
शास्त्र कहें अनुमन्य यही है
'उदय' परिस्थितिजन्य यही है
यही विवेक सम्मत सच्चा है
चुप रह जाना ही अच्छा है ।।

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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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