कहो प्रिये इस शाम क्या लिखूँ?

कहो प्रिये इस शाम क्या लिखूँ?
गीत तुम्हारे नाम क्या लिखूँ ?
अंतस्तल में तुम्ही चतुर्दिक
फिर तुमको पैगाम क्या लिखूँ ?

क्या लिख दूं बचपन की यादें
जब कंचे खेला करते थे
या जब पेड़ों की डालों पर
बिन रस्सी झूला करते थे
या जब बारिश के पानी मे
छप्प-छपाछप होता था
या जब खेतों में पत्तों को
सर पर रखकर सोता था
या जब थाली में पानी भर
कागज की कश्ती छोड़ी थी
या जब गाँव-मुहल्ले में
कोई लिल्लिल घोड़ी दौड़ी थी
या जब दुधिया की पत्ती से
तख्ती चमकाया करते थे
या फिर जो खड़िया मिट्टी से
सत्तर बन जाया करते थे ।

कहो आज लिख दूँ फिर से
कब चोरी चोरी दूध पिया था
कब छुपकर माखन खाया और
कब दो बार प्रसाद लिया था
कब अम्मा के बटुए से
चोरी से निकाले थे पैसे
कब पापा के होम्योपैथिक
औषधि निगले मिस्री जैसे
कब ऊंचे आमों के
सबसे पतली टहनी पर लटके
कब जामुन के ऊंची डालों पर
झेले आंधी - झटके ।

अगर कहो तो ये भी लिख दूँ
रस्तों पर कब धूल उड़ाया
छुट्टी की मन्नत में कब
किस किस पत्ती में गांठ लगाया
या जब लाल रंग से रचकर
हाथों में था जख्म बनाया
और मइया को दिखला करके
विद्यालय से पिंड छुड़ाया।
कहां पता था कि अम्मा तब
नकली घाव जान जाती थी
पर हाँ! हाथों से सहला कर
हठ को सदा मान जाती थी
'मेरा बुलबुल चोट खा गया'
कहकर आँचल में भर लेती
माथे पर प्यारा सा चुम्बन
देकर सारा दुःख हर लेती।

अब तो ये हैं स्वप्न सुनहले
बातें अभी तमाम क्या लिखूँ ?
जीवन है कठपुतली जैसा
कहां गया आराम क्या लिखूँ ?
कहो प्रिये इस शाम क्या लिखूँ?

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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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