आज अलि मैं क्या लिखूँ?

आज अलि मैं क्या लिखूँ?
भग्न बादल की अरुण आभा लिखूं
या सुनहले व्योम की मोहक कथा
सूखती सी झील की पीड़ा लिखूं
आज अलि मैं क्या लिखूं?

डबडबाई आंख कृषकों की झरी
कह रही चूल्हे के क्रंदन की कथा
धान की मुरझाई पीली पत्तियां
कहतीं सूखे खेत की अंतर्व्यथा
ठूंठ वृक्षों, दरकते से हिम के दर
अन्नदाता की असह पीड़ा लिखूं
(बालकों की ताल में क्रीड़ा लिखूं)
आज अलि मैं क्या लिखूं?

रास्तों पर है कहीं सैलाब भी
डूबते घर खेत हैं खलिहान हैं
घर-नगर भी हैं समंदर हो गए
चहकते दर्रे भी अब वीरान हैं
त्राष में है जिंदगी करती बसर
नन्हें पग की ठुमकती पीड़ा लिखू
(कैसे फिर संगीतमय वीणा लिखूं)
आज अलि मैं क्या लिखूं?

खोजते पगडंडियों पर दूर तक
जल निरखते शावकों का दल कहीं
झुंड चिड़ियों का चला है आस में
शिथिल हो गोधूलि तक वापस वहीं
तृषा का संचार है चारो पहर
पक्षियों की झुण्ड की पीड़ा लिखूं
आज अलि मैं क्या लिखूं ?

वन निरंतर कट रहे हैं घट रहे
प्रकृति से खिलवाड़ का ये दृश्य है
नदियां अंतिम तक विषैली हो चली
हम न देखें पर यही परिदृश्य है
है इसी से आज सूखा, बाढ़ भी
गांव है प्यासा कहीं बहता शहर
खो रहे अस्तित्व की पीड़ा लिखूं
आज अलि मैं क्या लिखूं ?

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