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श्री राम : कृपा निधान

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                   ॐ  श्री रघुनाथ के गहे चरण तो  रहेगा कहाँ दुःख, तन में न मन में ! जानकीनाथ करें जो कृपा तो समाये कहां सुख इस त्रिभुवन में ! रघुनंदन जो उठायें धनुष तो कौन है सम्मुख, धरती गगन में ! कौन विपत्ति हो, दुःख या दरिद्री जो मन चितवे श्री रमा-रमण में ! 'राम' का नाम कृपा के निधान बखान करूं कि रखूं निज मन में! जानकीवल्लभ दें जो अनुज्ञा तो  दास बनेंगे सकल त्रिभुवन में । भक्त सभी प्रभु तार दिए कि रहे प्रभु चाहे कुटीर में, वन में ठहरेंगे कोई भी कष्ट नहीं जो भजो प्रभु राम का नाम भजन में मत हो उदास, हताश न हो मन राम ही राम भजो जीवन में। राम करेंगे सुगम सब पंथ, कि श्री रघुवीर सा को देवन में! -- Dr. U. P. Singh Professor Department of Mathematics, Harcourt Butter Technician University Kanpur 

तिरंगा

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  तिरंगा तन तिरंगा मन तिरंगा और ये जीवन तिरंगा, आज है घर घर तिरंगा । आज है हर घर तिरंगा । ये तिरंगा देश के इतिहास का परिधान है ये तिरंगा विश्व भर मे शान्ति का संधान है ये तिरंगा हर एक भारतवासियों की शान है इस तिरंगे में बसी हम सब की आनोबान है ये तिरंगा देश की हर सुबह है हर शाम है इसके कण कण में बसा बलदानियों का नाम है । आओ हम सब इस तिरंगे को नमन कर लें अपनी सांसों मे हम उनका आचमन कर लें जिन्होंने बलिदान करके सांस अपनी देश को स्वातन्त्र्य की सांसें दिलाया जो चढ़े फाँसी, किया जीवन समर्पण राष्ट्र में स्वराज्य की वीणा बजाया । जिनके स्वर्णिम स्वप्न की रक्षा में अब भी देश के प्रहरी सदा क्षण - क्षण सजग हैं चहुँ दिशा सीमाओं पर पावन धरा के प्राण को हाथों में लेकर के अडिग हैं उनके पावन भूमि की दुनिया मे दस्तक है नमन करता उन्हें हर एक मस्तक । उनके पावन लक्ष्य का सत्कार करने और उनके स्वप्न को साकार करने  इस तिरंगे को लिये हम हाथ मे बढ़ते रहेंगे तिरंगे के शाख में ऊँचाईयाँ चढ़ते रहेंगे  ये तिरंगा विश्व का श्रेष्ठतम जनतंत्र है ये तिरंगा अनेकता में एकता ...

मन उदास है

क्या बोलूँ अब मन उदास है? खारा जल है, अमिट प्यास है। क्या बोलूँ अब मन उदास है? ००० भटका राह, काँच सा चटका, जीवन राग-द्वेष में अटका, सम्बन्धों को देकर झटका, वाह-वाह में हुआ दास है। क...

क्या लिख दूँ मैं? मन अशान्त है।

क्या लिख दूँ मैं ? मन अशान्त है ।। द्वेष ग्रसित मानव जंगल मे अर्ध दृश्य चेहरों के दल में इकलौतापन ही नितान्त है। क्या लिख दूँ मैं ? मन अशान्त है ।। प्रगति पंथ अत्यंत क्षीण है ज...

साथ चलने का दिल मे न हो हौसला

साथ चलने का दिल मे न हो हौसला रास्तों के न चर्चे चलाया करो प्रेम कर न सको गर कभी प्रेम से सामने आके मत मुस्कुराया करो।। ००० तुम हो दरिया, बहोगे अभी दूर तक बस्तियां भी उजड़ जाएं...

अतीत की स्मृति

एक कहानी बीत गयी और एक कहानी बाकी है यादों के गुलदस्ते की एक् याद सुहानी बाकी है आज मुझे मत झकझोरो, सपनो में डूबा रहने दो अभी अतीत के भवसागर में नाव चलानी बाकी है बेला की कोमल ...

द्वंद

हंसी आती भी नहीं और रो रहा भी नहीं । नींद में दिखता भी हूँ और सो रहा भी नहीं । ये कैसे मोड़ पे लाकर है वक्त ने छोड़ा ? पीछे हटता भी नहीं आगे हो रहा भी नहीं । बदन के कपड़ों पे ये कैसी धू...