ग़ज़ल
किसी ग़रीब को भी अपना बनाकर रक्खो
दिल मे इंसाफ की एक शम्मा जलाकर रक्खो।
रहो मानूस मगर दूरियां पुख्ता भी रहें
कहीं जज़्बात को सीने में दबाकर रक्खो।
तरन्नुम हूं तो मुझे लब पे सजाना वाज़िब
मैं हूँ आंसू अगर, पलकों में छुपाकर रक्खो।
गिनेंगे जख्म नहीं कभी बदन पर साहिब
कितने तरकश में हैं नावक ये बताकर रक्खो।
स्याह बढ़ता ही आ रहा है नज़र हर ज़ानिब
बाग में छोटा सा इक मोम जलाकर रक्खो।
लज़्ज़त-ए-शौक़ है जो ग़म से कनारा रखना
किसी यतीम को, मुफ़लिस को हंसाकर रक्खो।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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