द्वंद

हंसी आती भी नहीं
और रो रहा भी नहीं ।
नींद में दिखता भी हूँ
और सो रहा भी नहीं ।

ये कैसे मोड़ पे लाकर
है वक्त ने छोड़ा ?
पीछे हटता भी नहीं
आगे हो रहा भी नहीं ।

बदन के कपड़ों पे
ये कैसी धूल छाई है?
पहन पाना भी नहीं
और धो रहा भी नहीं ।

न जाने किस तरह इज़्ज़त
मिली है अबकी बार !
सहेज पाता भी नहीं हूँ,
खो रहा भी नहीं ।

ये कैसी झाड़ियां उग आयी हैं
इन खेतों में?
मैं काटता भी नहीं,
फ़स्ल बो रहा भी नहीं।

"उदय" ये पीठ पर आई है
द्वंद की गठरी ।
उतार पाता भी नहीं हूँ,
ढो रहा भी नहीं।
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--डॉ उदय प्रताप सिंह "अर्णव"

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