क्या लिख दूँ मैं? मन अशान्त है।

क्या लिख दूँ मैं ?
मन अशान्त है ।।
द्वेष ग्रसित मानव जंगल मे
अर्ध दृश्य चेहरों के दल में
इकलौतापन ही नितान्त है।
क्या लिख दूँ मैं ?
मन अशान्त है ।।

प्रगति पंथ अत्यंत क्षीण है
जन समष्टि हो रही जीर्ण है
बहकावे की शक्ति प्रबल है
लोभ-ग्रस्त जीवन पल-पल है
दिशा भ्रमित हो चुकी नियति है
हाय! कलंकित मानव गति है
महिमा - मण्डन, वाह - वाह में
विचलित मानव-मूल्य शान्त है
क्या लिख दूँ मैं ?
मन अशान्त है ।।

काव्य छंद-पद से वंचित है
वाणी मौन-सुधा सिंचित है
व्यथा द्वंदमय दिशा-भ्रमित है
आश्वासन भी स्वार्थ जनित है
सहज नगरिक चिन्तातुर है
सन्नाटा हर पल आतुर है
नायक छद्म वेश में प्रतिदिन
छलता जाता हृदय प्रान्त है
क्या लिख दूँ मैं ?
मन अशान्त है ।।

क्या स्मरण करें अब कल का
है विषाद कृषकों का छलका
दिवास्वप्न हो चुका हर्ष है
अवसादों से घिरा वर्ष है
कृषि कंटकमय कठिन पंथ है
त्याज्य नहीं, पीड़ा अनन्त है
नेत्रों में तब भी भविष्य की
आशा का सागर प्रशांत है
क्या लिख दूँ मैं ?
मन अशान्त है ।।
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डॉ० उदय प्रताप सिंह "अर्णव"

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