प्रियतम
सपनों को साकार कर लिया
मन को एकाकार कर लिया
बन्द नेत्रों से जिस दिन से
प्रियतम का दीदार कर लिया।
गीत राग की डोर बन गयी
तिमिर हृदय की भोर बन गयी
मधु-स्मृति आकर प्रिय तेरी
जाने कब चित-चोर बन गयी।
एक नया संसार मिल गया
जीवन का आधार मिल गया
जब से इस बंजर बगिया को
मीत तुम्हारा प्यार मिल गया।
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'
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