मैं खोजता जीवन !

मैं खोजता जीवन !
पल छटकते जा रहे हैं हाथ से
दल बिलगते जा रहे हैं साथ से
अब भला किस पर अमिट विश्वास कर
मैं बताऊँ हृदय की पीड़ा सघन ?
मैं खोजता जीवन !

बादलों के तिमिर का है ये पहर
जुगनुओं के भीड़ की ये दोपहर
छद्म जीवन के सुनहरे ऋतु में कब
खो गया है प्रेम का बादल गहन ?
मैं खोजता जीवन !

स्वार्थ के साये उमड़ते हर दिशा
डस रही सौहार्द्र को व्यसनी निशा
कब भला जीवन के नैतिक मूल्य अब
फिर धरेंगे मानवीय रूप-तन ?
मैं खोजता जीवन!

स्वार्थ से दूषित विचारों में निखर
अहं की तलवार को लेकर प्रखर
कलियुगी वीभत्स भीड़ें क्या भला
छीन लेंगी नेह ममता का वसन?
मैं खोजता जीवन!

ईंट का कंक्रीट का है ये शहर
खोजता हूँ मैं इसी में एक घर
क्या पता है अब मिलेगा या इसे
जला देगी धन-तृषा की ये तपन?
मैं खोजता जीवन!

इस व्यथा में आज व्याकुल है ये मन
व्यर्थ होता जा रहा मानव का तन
अधमता, दुष्कर्म के किस भंवर में जाकर
ले डुबायेगा मनुज को ये व्यसन?
मैं खोजता जीवन !

मधुर चिड़ियाँ गा रही हैं खेत मे
अनगिनत से जीव खुश हैं रेत में
क्यों भला ये बुद्धिजीवी मानवों को
लीलती जाती है माया की घुटन?
मैं खोजता जीवन!
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डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

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