जीत

इक तेरी मुस्कान जीती
बस तेरा ही शान जीता
हम तो हारे इस कदर
जैसे कोई सम्मान जीता ।।
चाँद तारे छिप गए पर
जुगनुओं का मान जीता
रात अंधियारी रही पर
दीप का अभिमान जीता ।।
मुश्किलो को झेलकर
करके उन्हें आसान जीता
जिंदगी की हर परीक्षा
में कोई अनजान जीता ।।
जब भी दोराहे पर आए
दम्भ का अरमान जीता
झाड़ियों की सनसनाहट
में सुरीला तान जीता ।।
क्या कभी भी बैर से
एक बैरी को इन्शान जीता
जीता तो बस एक ही है
जब भी हो भगवान् जीता ।।

डॉ उदय प्रताप सिंह 'अर्णव'

Comments

  1. मैं न जीता तू न जीता जीत कब दृष्टव्य है ।
    एक परमेश्वर ही जाने जीत कब भवितव्य है।

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